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त्रियुगीनारायण मंदिर, क्यों है ये मंदिर विवाह के लिए इतना प्रसिद्ध? मंदिर से जुड़ी सभी जानकारी, कैसे पहुंचे? कहाँ रुके? आदि (Triyuginarayan Temple, Why Is This Temple So Famous For Marriage? All Information Related To The Temple, How To Reach? Where To Stay? Etc.)

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भारत देश अपनी संस्कृति और प्राचीन सनातन धर्म के लिए जाना जाता है। भारत में न जाने कितने ही प्राचीन मंदिर हैं और हर मंदिर से जुड़ी हुयी एक कहानी है। भारत में वैसे तो हर धर्म के लोग रहते हैं और सभी अपने धर्म को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसका अस्तित्व सबसे पुराना माना जाता है। हिन्दू धर्म में तीन भगवान को सबसे सर्वोपरि माना गया है, जिसमे ब्रह्मा, विष्णु, और महेश। महेश यानी “भगवान शिव”। भगवान शिव के प्राचीन मंदिरो की बात करे तो वो कुछ रहस्यों और कहानियो से आज भी घिरे हुए हैं।

त्रियुगीनारायण मंदिर gate

भगवान शिव के मंदिरो में उत्तराखंड में स्थित सभी मंदिर बहुत ही पौराणिक और हिन्दू धर्म को मानने वालो के लिए एक आस्था का केंद्र हैं। उत्तराखंड में स्थित ज्यादातर शिव मंदिर पहाड़ो के बीच स्थित हैं वही कुछ मंदिर मुख्य शहर में भी। आज हम जिस मंदिर की बात करने जा रहे हैं वो उत्तराखंड का “त्रियुगीनारायण मंदिर” है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है की यह वही मंदिर है, जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था, यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है । तो आईये जानते हैं इस मंदिर के बारे में और इससे जुड़ी सभी जानकारियों को।

Table of Contents

त्रियुगीनारायण मंदिर कहाँ स्थित है?

त्रियुगीनारायण मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में स्थित है। यह सोनप्रयाग से लगभग 13 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। केदारनाथ जाने वाले श्रद्धालु जिनको इस मंदिर के बारे में पता है वो सभी मंदिर में दर्शन करने के पश्चात ही केदारनाथ जाने के लिए प्रस्थान करते हैं। यह मंदिर 6500 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहाँ आप मंदाकनी और सोनगंगा नदी का संगम देख सकते हैं।

त्रियुगीनारायण मंदिर क्यों प्रसिद्ध है?

यह मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह स्थल माना जाता है। ऐसा कहा जाता है की माता पार्वती जो माता सती का पुनर्जन्म थी उन्होंने इस मंदिर के पास में भगवान शिव से शादी की थी।

पार्वती जी और शिव जी के विवाह स्थल और विवाह से अब तक जलती हुई अखंड ज्योत की वजह से इस मंदिर का इतना महत्व माना जाता है। इस मंदिर के प्रांगण में बने कुंड में जलती हुयी अखंड ज्योति की राख को श्रद्धालु अपने साथ ले जाते हैं। जिसका महत्व यह है की वो उनके वैवाहिक जीवन को सुख और शांति से भर देगी।

यह माना जाता है की यह भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह स्थल है, जिस कारण यहाँ पर लोग विवाह करने आते हैं। लोगो का मानना है की यहाँ किया गया विवाह बहुत ही अच्छ और जीवन को सफल करने वाला होता है, इसलिए ये पूरा गांव शादियों के लिए बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध माना जाता है।

त्रियुगीनारायण मंदिर किसको समर्पित है?

त्रियुगीनारायण मंदिर को भगवान शिव और माता पार्वती का वैवाहिक स्थल तो माना जाता है, लेकिन यह मंदिर भगवान विष्णु के पांचवे अवतार भगवान वामन और माता लक्ष्मी को समर्पित है। इस मंदिर में आप माता लक्ष्मी, ज्ञान की देवी माता सरस्वती और भगवान विष्णु की प्रतिमा को देख सकते हैं और दर्शन कर सकते हैं। इस मंदिर के पास ही चार कुंड बने हुए हैं, ब्रह्म कुंड, विष्णु कुंड, रूद्र कुंड, और सरस्वती कुंड। इन कुंडो की भी बहुत मान्यता है।

त्रियुगीनारायण मंदिर का निर्माण किसने कराया?

त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण श्री शंकराचार्य ने कराया था। उत्तराखंड के अधिकतर मंदिरो के निर्माण का श्रेय शंकराचार्य को ही दिया जाता है। ऐसा भी माना जाता है जब विष्णु भगवान ने माता पार्वती के भाई के रूप में विवाह के सभी कार्यो को किया था तब उस समय के यहाँ के राजा और माता पार्वती के पिता हिमावत ने इस मंदिर की स्थापना की थी। मंदिर की शैली केदारनाथ मंदिर से मिलती झूलती ही है।

triyuginarayan mandir

क्या है त्रियुगीनारायण मंदिर की पौराणिक कहानी?

त्रियुगीनारायण मंदिर भगवान विष्णु के पांचवे अवतार वामन को समर्पित है, लेकिन ये मंदिर जिस वजह से प्रसिद्ध है वह है इस मंदिर के पास हुयी भगवान शिव और माता पार्वती जी का विवाह। तो आइये जानते हैं इस कहानी को..

त्रेतायुग में माता पार्वती जी का जन्म राजा दक्ष के घर हुआ, जो की माता सती का पुनर्जन्म थी। जब माता सती और भगवान शिव का विवाह होना था तब राजा दक्ष नहीं चाहते थे की उनकी पुत्री का विवाह भगवान शिव से हो, लेकिन ब्रह्मा जी के समझाने पर राजा दक्ष विवाह के लिए मान गए। एक दिन राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान कर दिया, जिसकी वजह से माता सती ने यज्ञ कुंड में कूद कर अपनी जान दे दी।

भगवान शिव को जब यह बात पता लगी तो उन्होंने माता सती को गोद में उठाकर तांडव करना शुरू कर दिया। भगवान शिव के क्रोध भरे तांडव से पृथ्वी डोलने लगी, जिसकी वजह से सभी देवतागण और पृथ्वीवासी भयभीत होने लगे। जब भगवान विष्णु ने यह देखा तो उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के कई भाग कर दिए। जिसके बाद भगवान शिव गहरे ध्यान योग में चले गए।

माता सती के शरीर के भाग या आभूषण पृथ्वी पर जिस-जिस जगह गिरे वहां शक्ति पीठ की स्थापना हुयी। एक ऐसे ही शक्ति पीठ मध्य प्रदेश में है, जिसे “मैहर माता” के नाम से जाना जाता है। जिसकी जानकारी हमने अपने ब्लॉग में दी, कृपया उसे भी जरूर पढ़े।

माता सती ने राजा हिमावत के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया जो की पार्वती जी के नाम से जानी गई। माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए घोर तपस्या की। वहीं माता सती की मृत्यु के कारण भगवान शिव गहरे ध्यान योग में थे।

एक राक्षस जिसका नाम तारकासुर था। उसके आतंक से सभी देवतागण बहुत ही ज्यादा भयभीत थे। तारकासुर को वरदान था की उसका वध सिर्फ भगवान शिव के संतान द्वारा ही किया जा सकता है। जिस कारण सभी देवता भगवान शिव को मनाने के लिए उनके पास गए। किसी तरह सभी देवताओ ने भगवान शिव को ध्यान में से उठाया और उनसे माता पार्वती से विवाह करने का निवेदन किया।

सभी देवताओ ने शिव जी को माता पार्वती के बारे में सभी बाते बताई। जब भगवान शिव को माता पार्वती की भक्ति के बारे में पता लगा तब भगवान शिव माता की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और माता से विवाह के लिए राजी हो गए। माता पार्वती जो की पहाड़ो में कहीं तपस्या में लीन थी। जो की आज गौरी कुंड के नाम से जानी जाती है , जो केदारनाथ का बेस कैंप है। भगवान शिव ने माता के सामने विवाह का प्रस्ताव गुप्तकाशी के काशी विश्वनाथ मंदिर में रखा। काशी विश्वनाथ मंदिर से सम्बंधित सभी जानकारी को पढ़े।

जब सभी लोग विवाह के लिए राजी हो गए तब विवाह से सम्बंधित सभी कार्य इस मंदिर में हुए जो आज त्रियुगीनारायण मंदिर के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है की इस मंदिर के सामने आज भी कुंड में तब से जलाई गई ज्योति आज भी जल रही है। विवाह में माता पार्वती के भाई के रूप में भगवान विष्णु जी ने सभी कार्य किये थे और विवाह में पुजारी की भूमिका ब्रह्मा जी ने निभाई थी। यह मंदिर त्रियुगीनारायण गांव में स्थित है विवाह के सभी कार्य यहीं हुए थे।

विवाह में सभी देवतागण पधारे थे, कहा जाता है की मंदिर के पास ही चार कुंड भी बने हुए हैं, जिसमे सभी देवताओ ने स्नान किया था और भगवान शिव के विवाह में शामिल हुए थे। जो आज रूद्र कुंड, विष्णु कुंड, ब्रह्म कुंड और सरस्वती कुंड के नाम से जाने जाते हैं। सरस्वती कुंड को बहुत ही पवित्र माना जाता है क्यूंकि कहाँ जाता है की यह कुंड भगवान विष्णु के नाभि से उत्पन हुआ है।

तो कुछ इस प्रकार है इस मंदिर से जुड़ी हुयी भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की कहानी।

क्या है अग्निकुंड और जल कुंड से जुड़ी मान्यता?

मंदिर के पास सामने की ओर एक हवन कुंड स्थित है जिसमे हमेशा अग्नि जलती रहती है। इसके बारे में कहा जाता है की यह अग्नि भगवान शिव के विवाह से लेकर आज तक जलती आ रही है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु इस कुंड में लकड़ी को चढ़ाते हैं और इस कुंड से अपने साथ राख लेकर जाते हैं। इस कुंड की राख को बहुत ही पवित्र माना जाता है और ऐसा कहा जाता है की यह राख संयुग्मक आनंद को बढ़ती है। इस बात में कितनी सच्चाई है इस बारे में हम कुछ भी नहीं कहे सकते हैं।

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वहीं मंदिर के पास में ही चार जल कुंड स्थित हैं, रूद्र कुंड, विष्णु कुंड, ब्रह्म कुंड, और सरस्वती कुंड। जिनके बारे में मान्यता है की जब भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह में सभी देवतागण आये थे तब इन्ही कुंडो में देवताओ ने स्नान किया था। वैसे इन सभी कुंड की अपनी महत्वता है लेकिन सरस्वती कुंड को सबसे ज्यादा पवित्र माना जाता है, क्यूंकि ऐसा कहा जाता है की सरस्वती कुंड का उद्गम भगवान विष्णु के नाभि से हुआ है और बाकि के कुंड में इसी कुंड से जल जाता है।

इन कुंडो का जल इतना पवित्र माना जाता है की कहा जाता है की इस कुंड के जल से बांझपन का निवारण हो जाता है। इस बात में कितनी सच्चाई है इसके बारे में हम नहीं कह सकते हैं।

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मंदिर की संरचना और बाहर का द्रश्य

अगर मंदिर की संरचना की बात करे तो मंदिर केदारनाथ मंदिर की तरह ही अपनी पूरानी शैली का बना हुआ है। ऐसा कहा जाता है की स्थापना यहाँ के राजा हिमावत ने की थी तथा इस मंदिर के निर्माण के बारे में कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण श्री शंकराचार्य ने कराया था।

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मंदिर के अंदर भगवान विष्णु के प्रतिमा स्थापित है उनके साथ ही माता लक्ष्मी और माता सरस्वती की प्रतिमा भी स्थापित है, जिनकी पूजा की जाती है। मंदिर के अंदर ही सामने की ओर एक अनंत ज्योत वाला हवन कुंड है, जिसमे अग्नि पिछले 3 युगो से जलती आ रही है। कहते हैं, यह वही कुंड है जिसके चारो ओर भगवान शिव और माता पार्वती ने सात फेरे लिए थे। लोग इस कुंड में लकड़ी चढ़ाते हैं और यहाँ से राख लेकर जाते हैं जो बहुत ही पवित्र मानी जाती है।

मंदिर के सामने ही एक ब्रह्म शिला नामक पत्थर भी है जो भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का सही स्थान माना जाता है। मंदिर के प्रागण में ही एक सरस्वती गंगा नमक जल धारा बहती है जो मंदिर में ही बने सभी कुंडो का जल स्रोत है। मंदिर में चार कुंडो को बहुत महत्व दिया जाता है, जिसमे रूद्र कुंड, विष्णु कुंड, ब्रह्म कुंड और सरस्वती कुंड हैं। वैसे यहाँ पर कुल सात कुंड हैं।

यहाँ रुकने के लिए होटल्स और लॉज हैं?

अगर आप अपनी केदारनाथ की यात्रा पर हैं तो इस मंदिर में दर्शन के लिए जरूर जाए। सोनप्रयाग में रुकने से अच्छा यह रहता है की आप यहाँ त्रियुगीनारायण गांव में रहें। यहाँ आपको सोनप्रयाग की तुलना में बहुत ही अच्छे और सस्ते रूम मिल जायेंगे। यहाँ रुकने के लिए कुछ लाँज और होटल्स हैं, जो की आपके बजट में होंगे। यहाँ पर ज्यादातर रूम ग्रुप के हिसाब से होते हैं, तो अगर आप अकेले या दो लोग हैं तो रूम आपको थोड़ा महँगा पड़ सकता है।

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यहाँ खाने के होटल्स और दुकाने हैं?

त्रियुगीनारायण मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह स्थल होने के कारण यहां पर लोग दूर दूर से अपना विवाह करने आते हैं। वैवाहिक स्थल होने की कारण आपको यहाँ पर खाने के होटल्स से लेकर छोटी दुकाने भी मिल जाएँगी।

यहाँ पर आपको आपके बजट के अनुसार सभी तरह का खाना मिल जायेगा जिसका आप आनंद उठा सकते हैं। यहाँ कुछ होटल्स तो ऐसे हैं जहाँ आपको सुन्दर वादियों के नज़ारो के साथ खाना परोसा जाता है। जो सच में बहुत ही सुन्दर पलो में से एक होता है।

त्रियुगीनारायण मंदिर तक कैसे पहुंचे?

आपने इस मंदिर से जुड़ी लगभग सभी जानकारियों को जान लिया है। जैसे इस मंदिर की कहानी क्या है? यहाँ रुकने की व्यवस्था क्या है? क्या है इस मंदिर की मान्यता? आदि। तो आइये अब जानते हैं की इस मंदिर तक कैसे पहुंच सकते हैं।

फ्लाइट द्वारा कैसे पहुंचे?

इस मंदिर में श्रद्धालु ज्यादतर केदारनाथ जाते वक़्त ही आते हैं तो अगर आप इस मंदिर तक फ्लाइट द्वारा आना चाहते हैं तो यहाँ से सबसे निकट एयरपोर्ट जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है, जो की देहरादून में है।

देहरादून से सोनप्रयाग तक की दुरी 246 किलोमीटर की है। सोनप्रयाग से मंदिर तक की दुरी लगभग 13 किलोमीटर की है। देहरादून से बाकि की दुरी आपको सड़कमार्ग द्वारा ही कम्पलीट करनी होगी। देहरादून के लिए आपको फ्लाइट दिल्ली से मिल जाएगी बाकि देहरादून के लिए फ्लाइट भारत के कुछ बड़े शहरों से भी आपके लिए मिल जाएँगी।

ट्रेन द्वारा कैसे पहुंचे? (How to Reach by Train?)

अगर आप यहाँ ट्रेन द्वारा आना चाहते हैं, तो यहाँ से सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन ऋषिकेश रेलवे स्टेशन और देहरादून रेलवे स्टेशन है। ऋषिकेश से त्रियुगीनारायण मन्दिर तक की दुरी 216 किलोमीटर की है।

ऋषिकेश से आपको प्राइवेट टैक्सी मिल जाएँगी सोनप्रयाग के लिए जहाँ से आप त्रियुगीनारायण मन्दिर के लिए जा सकते हैं। अगर आप केदारनाथ की यात्रा पर है और अपने किसी गाड़ी को बुक किया है तो उससे यहाँ मंदिर तक जाने की बात भी कर ले, बरना वो लोग आपको सीधे सोनप्रयाग ले जायेंगे और वहां से सीधे केदारनाथ का ट्रेक करने के लिए कहेंगे।

बस द्वारा कैसे पहुंचे?

अगर आप त्रियुगीनारायण मन्दिर बस द्वारा जाना चाहते हैं तो आपको ऋषिकेश और देहरादून से बसे सोनप्रयाग के लिए मिल जाएँगी। यहाँ सरकारी बसे कुछ नियमित समय पर ही चलती हैं।

इसके साथ ही आपको यहाँ के लिए बसे हरिद्वार, गढ़वाल और कुछ कुमां के पहाड़ी इलाको से भी मिल जाएगी। अगर आप बस द्वारा यहाँ आ रहें हैं तो आप सबसे पहले दिल्ली जाये। दिल्ली से आपको बसे देहरादून, ऋषिकेश और हरिद्वार के लिए आराम से मिल जाएँगी। इसमें सरकारी बसे और प्राइवेट वॉल्वो बसे दोनों ही शामिल हैं।

त्रियुगीनारायण मंदिर के आस पास की जगह

जब आप यहाँ इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं तो आप इसके आस पास के प्रसिद्ध मंदिर में भी दर्शन के लिए जा सकते हैं। इस मंदिर के आस पास की कुछ जगह जहाँ आप जा सकते हैं, अब उनके बारे में जानते हैं

काशी विश्वनाथ मंदिर

त्रियुगीनारायण मंदिर में दर्शन के पश्चात आप यहाँ से 37 किलोमीटर दूर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर भी जा सकते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में कहा जाता है की यहाँ ही भगवान शिव ने माता पार्वती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था। इस मंदिर से सम्बंधित सभी जानकारियों को हमने अपने पीछे ब्लॉग बताया है। अगर आपने वह नहीं पढ़ा है तो उसे भी एक बार पढ़े।

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उखीमठ

अगर आप त्रियुगीनारायण मन्दिर सर्दियों के समय में आ रहे हैं तो आप मंदिर से 49 किलोमीटर दूर उखीमठ भी जा सकते हैं। इस मंदिर का महत्व सर्दियों में काफी बढ़ जाता है क्यूंकि सर्दियों में अधिक बर्फवारी होने के कारण केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। तब भगवान शिव के केदार रूप के दर्शन आप यहाँ उखीमठ में कर सकते हैं।

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गौरीकुंड (Gaurikund)

आप त्रियुगीनारायण मंदिर से 13 किलोमीटर की दुरी पर स्थित गौरीकुंड भी जा सकते हैं। गौरीकुंड का भी अपना अलग महत्व है और इसकी भी माता गौरी से सम्बंधित कहानी है। जिसकी बात हम अपने आगे आने वाले ब्लॉग में करेंगे। गौरी कुंड केदारनाथ यात्रा का बेस कैंप है। जहाँ से केदारनाथ यात्रा का ट्रेक शुरू होता है।

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केदारनाथ (Kedarnath)

यहाँ का सबसे मुख्य तीर्थस्थल केदारनाथ है, जिसका ट्रेक गौरी कुंड से 22 किलोमीटर का है। केदारनाथ की सभी जानकारियों को हम अपने पिछले ब्लॉग में बता चुके हैं। अगर आपने वो ब्लॉग नहीं पढ़ा है तो एक बार उसे भी पढ़े। केदारनाथ की कहानी भी महाभारत से जुड़ी हुयी है जिसके बारे में हमने अपने पिछले ब्लॉग में विस्तार से बताया है तो उसे जरूर पढ़े।

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कुछ ध्यान रखने योग्य बाते (Some Things to Keep in Mind)

  • आप जब भी केदारनाथ की यात्रा पर हों तो इस मंदिर में दर्शन के लिए जरूर जाये। इस मंदिर के लिए सोनप्रयाग से पहले ही रास्ता कटी है।
  • आप अगर चार धाम की यात्रा पर हैं और आपने हरिद्वार या ऋषिकेश से किसी गाड़ी को बुक किया है तो आप उससे पहले ही इस मंदिर तक जाने की बात कर ले।
  • यहाँ मौसम ठंडा ही रहता है तो अपने साथ गर्म कपड़े और नियमित तौर पर ली जाने वाली कुछ दवाई जरूर रखे।
  • अगर आप सोनप्रयाग में एक रात रुकने वाले हैं तो इससे अच्छा है की आप यहाँ त्रियुगीनारायण गांव में रुके। जो की बहुत ही सूंदर और यहाँ पर सोनप्रयाग की तुलना में रूम भी सस्ते मिलते हैं।
  • अगर आप अपनी गाड़ी से जा रहे हैं तो यहाँ पर रात में ड्राइव करने से हमेशा बचे।

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